सत का संग , जन्हा सिर्फ नाम की या परमात्मा की बात कही जाती है, बाहरी व् आतंरिक सत्संग है, भीतर में आत्मा शब्द से जुड़कर सत्संग करती है, बाहर महापुरुषों का सत्संग है, सत्संग की प्राप्ति परमात्मा की दया मेहर से अवं गुरु की कृपा से होती है. सत्संग के अनेक लाभ है, संगती का असर, रहनी और करनी सुधरती है, परमात्मा से मिलने की तड़प लगती है, मन निर्मल होता है, सुकून मिलता है, सत्संग हर बुराई से बचाता है, मन को अहिस्ता अहिस्ता पवित्र करता है, उसकी मेल दूर करता है, संसार की व्यर्थ बातो से भी दूर करता है. परमार्थ की समझ सत्संग से ही आती है, कई प्रकार के कर्म कट जाते है.
गोविन्द जिओ सत्संगति मेल हरी dhiyiye …गुरु रामदासजी कहते है, संतो की संगती दो ताकि तुमरी पूजा कर सके , तुजसे मिलाप कर सके.
गुरु नानक देवजी- सत्संगति कैसी जानिए जिथे एको नाम बखानिये . स्वामीजी – सत्संग किसको कहत है, सो भी तुम सुन लेy , सतनाम सत्पुरुष का जहाँ कीर्तन होए. फिर आपजी कहते है, प्रिथम सरन गहो सतगुरु की, दुतिये बाड धारो सत्संग की.
आइंस्टीन एक बहुत बड़े वैग्ग्य्निक हुवे है, वे जगह जगह जब लेक्चर देने जाते, उनका ड्राईवर भी उनके लेक्चर ध्यान से सुनता था, एक दिन आइंस्टीन थक गए और ड्राईवर से कहा एक लेक्चर छोड़ घर चलते है, ड्राईवर जो समझदार था , कई दिनों से व्यगानिक का साथ भी था, सो बोला सर, आप मेरी ड्रेस पहन सभा में आराम करे, में लेक्चर आप के कपडे पहन कर दे दे दुगा, आइंस्टीन ने सोचा चलो देखे क्या होता है, ड्राईवर ने बखूबी लेक्चर दिया जैसा रोज देखता और सुनता था, तभी एक महानुभाव ने प्रश्न किया , जो बड़ा जटिल था और ड्राईवर के बस का नही था, लेकिन बिना घबराये उसने अक्ल से काम लिया और कहा अरे भाई, इसका जवाब तो मेरे ड्राईवर भी दे सकते है, और पीछे हाल में बैठे आइंस्टीन की और इशारा कर दिया , जिसका उतर उन्होंने दे दिया. सो सांगत का यही असर है, कोई गुड सांगत हो तो लोहा लकड़ी के साथ तर जाये और बुरी सांगत हो तो लकड़ी भी डूब जाये. संत महत्मा की सांगत हमें कामयाब बना देती है, मोह माया के जंजाल से छुड़ाकर आजाद कर देत्ती है, वर्ना जिव संसार के पचड़ो में पड़कर अपना मनुष्य जनम खो देता है, जो बड़ी मुश्किल से मिलता है, और बार बार नहीं मिलता. बाग़ में अगर एक अँधा व्यक्ति जाता है, तो हम समझ सकते है, की वह देख नहीं पायेगा, लेकिन वहां की सांगत कर वह बाग़ की खुशुबू तो ले ही लेता है. यही महिमा संतो के संत्संग की ही, अनेको अनेक फायेदे हमें बस बैठने से ही प्राप्त हो जाते है, इसलिए हमें जितना हो सके संतो के सत्संग का लाभ लेना है.
एक छोटी कहानी है, एक बालक जो गुड कंपनी में नहीं था, अपने दोस्तों को छोड़ने को राजी नही होता, माँ बाप के सअम्झने के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ता था. उसके पेरेंट्स ने एक महत्मा की शरण ली, महत्मा ने बालक को बुलाया, बालक बोला महत्मा जी आप कुछ भी कहेंगे में अपने दोस्तों को नहीं छोड़ सकता. महत्मा जी बोले में तो केवल एक एक्सपेरिमेंट आप को बता रहा हु, और कुछ नहीं, बालक थोडा इंटरेस्ट लिया और महत्मा की और आया. महत्मा के पास तीन गिलास थे, जिसमे कृमशः चार् कोल, मिट्टी और चन्दन का पाउडर था. उन्होंने बालक से कहा इन गिलास को पानी से भर दो, और समझ कर बताओ क्या सीखा इस एक्सपेरिमेंट से. बालक ने पहले गिलास में पानी डाला वह काला हो गया क्योकि उसमे कोयला था, दुसरे में पानी मेला हो गया कियोकी उसमे मिटटी थी, तीसरे गिलास में चन्दन की खुशुबू उठी, बालक को अक्ल आ गयी, उसने कहा, में वाटर की तरह हु, जन्हा जाऊंगा उसके गुण ले लूँगा. सांगत का यही फायदा है.